सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कहा गया था कि “स्तन पकड़ना” और “लड़की के पायजामे की डोरी तोड़ना” बलात्कार या बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। इस आदेश पर देशभर में नाराजगी जताई गई और इसे असंवेदनशील करार दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इस पर सुनवाई की और हाई कोर्ट के आदेश को कानून के सिद्धांतों के खिलाफ बताया।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
शीर्ष अदालत ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला अचानक नहीं लिया गया था, बल्कि इसे सुरक्षित रखने के चार महीने बाद सुनाया गया। इससे साफ होता है कि निर्णय लेते समय विवेक का प्रयोग किया गया था, लेकिन फिर भी इसमें संवेदनशीलता की कमी देखी गई।
जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, “हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि इस फैसले में संवेदनशीलता की कमी दिखती है। यह फैसला अचानक नहीं लिया गया था, बल्कि चार महीने बाद सुनाया गया, जिसका मतलब है कि इस पर विचार किया गया था।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “हम आमतौर पर इस स्तर पर किसी आदेश पर स्थगन देने में हिचकिचाते हैं, लेकिन चूंकि हाई कोर्ट के फैसले के कुछ अंश कानून के सिद्धांतों से भटके हुए हैं और अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाते हैं, इसलिए हम उन टिप्पणियों पर रोक लगाते हैं।”
केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है।
अदालत ने कहा, “हम केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और हाई कोर्ट में पक्षकारों को नोटिस जारी करते हैं। इस मामले में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल न्यायालय की सहायता करेंगे।”
गौरतलब है कि 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने इसी मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
यह विवादास्पद आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस समय दिया था जब वह दो आरोपियों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इन दोनों आरोपियों को एक निचली अदालत ने बलात्कार के मामले में तलब किया था।
आरोपी पवन और आकाश पर आरोप था कि उन्होंने 11 वर्षीय लड़की के स्तन पकड़े, उनमें से एक ने उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी और उसे जबरदस्ती पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश की।
इस पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने फैसला दिया कि “सिर्फ स्तन पकड़ना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता, लेकिन यह किसी महिला के खिलाफ हमला या आपराधिक बल के प्रयोग की श्रेणी में जरूर आता है, जिसका उद्देश्य उसे निर्वस्त्र करना या नग्न होने के लिए मजबूर करना हो।”
हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपियों पर हमले के आरोपों के साथ-साथ POCSO अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस धारा के तहत दोष सिद्ध होने पर अपेक्षाकृत कम सजा का प्रावधान है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है और केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। इस फैसले को लेकर समाज में व्यापक विरोध देखने को मिला था, और अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में उचित कानूनी कदम उठाए जाएंगे।
